लड़ाई के दौरान 'मारो साले को' कहना हत्या का इरादा नहीं, 22 साल पुराने केस में दिल्ली HC का बड़ा फैसला
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 साल पुराने एक चर्चित हत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी झगड़े के दौरान केवल “मारो साले को” कह देने मात्र से हत्या करने का साझा इरादा साबित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे शब्दों का अर्थ परिस्थितियों के अनुसार किसी व्यक्ति को पीटने या चोट पहुंचाने का हो सकता है, न कि अनिवार्य रूप से उसकी हत्या करने का।
इस महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए मुकेश कुमार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता को हत्या की साजिश, हथियारों की मौजूदगी या सह-आरोपितों की मंशा के बारे में पहले से कोई जानकारी थी।
यह फैसला आपराधिक मामलों में ‘साझा इरादे’ (Common Intention) की कानूनी अवधारणा की व्याख्या के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
न्यायालय ने सुनाया अहम फैसला
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने मुकेश कुमार की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि केवल एक वाक्यांश के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि “मारो” शब्द का अर्थ विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है। इसका मतलब किसी को पीटना, धक्का देना या चोट पहुंचाना भी हो सकता है। केवल इस शब्द के प्रयोग से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी का उद्देश्य किसी व्यक्ति की हत्या करवाना था।
पीठ ने कहा कि हत्या के अपराध में दोष सिद्ध करने के लिए यह साबित करना आवश्यक होता है कि आरोपी का अपराध में सक्रिय योगदान था या वह हत्या की योजना और इरादे से पूरी तरह अवगत था। वर्तमान मामले में ऐसे पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
1983 की बस में हुई घटना से जुड़ा मामला
यह मामला एक दिसंबर 1983 को दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (डीटीसी) की रूट नंबर 431 की बस में हुई घटना से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार बस में यात्रा के दौरान कुछ युवकों के एक समूह ने दो महिला यात्रियों के साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया था। बस में मौजूद विनोद कुमार और उनके कुछ दोस्तों ने इस व्यवहार का विरोध किया। विरोध के बाद दोनों पक्षों के बीच बहस शुरू हुई, जो धीरे-धीरे झगड़े में बदल गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बस के भीतर माहौल तनावपूर्ण हो गया और दोनों पक्षों के बीच हाथापाई होने लगी। इसी दौरान सह-आरोपित बलविंदर सिंह ने कथित रूप से चाकू निकालकर विनोद कुमार पर हमला कर दिया।
चाकू लगने से विनोद गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
कई लोगों को बनाया गया आरोपी
पुलिस जांच के दौरान मुकेश कुमार समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। जांच एजेंसियों का दावा था कि झगड़े के दौरान मुकेश कुमार बस के पिछले हिस्से में खड़ा था और उसने “मारो साले को” कहकर अन्य आरोपियों को उकसाया था।
अभियोजन पक्ष का तर्क था कि यह कथन हत्या के लिए उकसाने वाला था और इससे यह साबित होता है कि मुकेश भी अपराध में समान रूप से शामिल था।
पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया और मामला ट्रायल कोर्ट में चला।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
लंबी सुनवाई के बाद अगस्त 2004 में ट्रायल कोर्ट ने मुकेश कुमार और दो अन्य आरोपियों को हत्या सहित विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार दिया था।
अदालत ने माना था कि सभी आरोपियों ने मिलकर अपराध को अंजाम दिया और उनमें साझा आपराधिक इरादा मौजूद था। इसके आधार पर मुकेश कुमार को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
हालांकि मुकेश कुमार ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी और दावा किया कि वह हत्या में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं था। उसने कहा कि उसके खिलाफ केवल एक कथित बयान के आधार पर कार्रवाई की गई है और उसे गलत तरीके से दोषी ठहराया गया है।
हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की गहराई से जांच की
अपील की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पूरे मामले के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की विस्तार से समीक्षा की।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि मुकेश कुमार को पहले से पता था कि उसके साथ मौजूद किसी व्यक्ति के पास चाकू है।
पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि मुकेश और अन्य आरोपियों के बीच पहले से कोई आपराधिक योजना बनाई गई थी।
अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को हत्या के अपराध में समान रूप से जिम्मेदार ठहराना है, तो यह दिखाना आवश्यक है कि वह अपराध के उद्देश्य और परिणाम से पूरी तरह परिचित था।
साझा इरादे की अवधारणा पर टिप्पणी
फैसले में अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के तहत लागू होने वाले ‘साझा इरादे’ के सिद्धांत पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि केवल किसी घटना स्थल पर मौजूद होना या उत्तेजना में कोई सामान्य टिप्पणी कर देना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होता है कि आरोपी और मुख्य अपराधी के बीच स्पष्ट समझ, योजना या साझा उद्देश्य था।
न्यायालय ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब उसके खिलाफ प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य उपलब्ध न हों।
कानूनी विशेषज्ञों ने फैसले को बताया महत्वपूर्ण
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जहां किसी व्यक्ति को केवल मौखिक टिप्पणी या घटनास्थल पर मौजूदगी के आधार पर गंभीर अपराधों में आरोपी बनाया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि हत्या जैसे अपराध में दोष सिद्ध करने के लिए केवल अनुमान या परिस्थितिजन्य व्याख्या पर्याप्त नहीं है। इसके लिए मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों का महत्व
यह फैसला एक बार फिर दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले साक्ष्यों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को सर्वोच्च महत्व देती है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार किसी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक उसके खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध न हो जाएं।
22 साल पुराने इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का गहन परीक्षण करने के बाद मुकेश कुमार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि झगड़े के दौरान बोले गए शब्दों की व्याख्या परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए, न कि केवल उनके शाब्दिक अर्थ के आधार पर।

कोई टिप्पणी नहीं